गौतम बुद्ध और जाति व्यवस्था: क्या हम आधा सच जानते हैं?


 गौतम बुद्ध और जाति व्यवस्था: क्या हम आधा सच जानते हैं? 

1. परिचय आधुनिक सामाजिक विमर्श में गौतम बुद्ध को प्रायः एक ऐसे 'सामाजिक क्रांतिकारी' के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिन्होंने तत्कालीन वर्ण व्यवस्था की जड़ों पर प्रहार कर उसे समूल नष्ट कर दिया था। किंतु एक सांस्कृतिक इतिहासकार और धर्मशास्त्री के दृष्टिकोण से जब हम बुद्ध के मूल वचनों (बुद्ध वचन) और शास्त्रीय ग्रंथों का निष्पक्ष विश्लेषण करते हैं, तो एक नितांत भिन्न और जटिल सत्य उभरता है। क्या बुद्ध ने वास्तव में वर्ण व्यवस्था का उन्मूलन किया था, या उन्होंने केवल उसकी प्राथमिकताओं को एक नया स्वरूप प्रदान किया था? यह लेख बुद्ध के उन ऐतिहासिक और दार्शनिक पहलुओं का अन्वेषण करता है, जो प्रायः आधुनिक विचारधाराओं के शोर में ओझल हो जाते हैं।

2. भगवान राम के वंशज: बुद्ध की अपनी पहचान बौद्ध परंपरा और स्वयं बुद्ध के वचनों के अनुसार, वे स्वयं को इस आर्यावर्त की प्राचीन सनातन परंपरा से विच्छिन्न नहीं मानते थे। स्रोतों के अनुसार, बुद्ध ने स्पष्ट रूप से स्वयं को इक्ष्वाकु वंश का बताया और स्वयं को भगवान राम का वंशज स्वीकार किया। यह तथ्य उन विमर्शों को गहरी चुनौती देता है जो बुद्ध को भारतीय मूल परंपरा के विरुद्ध एक बाहरी विद्रोह के रूप में चित्रित करते हैं। बुद्ध की स्वयं की पहचान एक ऐसे महापुरुष की थी जो अपने गौरवशाली क्षत्रिय वंश और उसकी परंपराओं के प्रति न केवल सचेत थे, बल्कि उसे अपनी श्रेष्ठता का आधार भी मानते थे।

3. वर्ण व्यवस्था का 'नया' क्रम: क्षत्रिय सबसे ऊपर प्रचलित धारणा के विपरीत, बुद्ध ने वर्ण व्यवस्था के अस्तित्व को नकारा नहीं, बल्कि उसके पदानुक्रम को पुनर्व्यवस्थित किया। जहाँ वैदिक परंपरा में ब्राह्मणों को शीर्ष पर रखा गया था, वहीं बुद्ध ने 'क्षत्रिय' (पालि में 'खत्तिय') को सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित किया। बौद्ध सुत्तों में सामाजिक सोपान का क्रम सदैव "खत्तिय, ब्राह्मण, वैश्य और सुद्द (शूद्र)" के रूप में मिलता है। बुद्ध का तर्क था कि वंश और गोत्र की शुद्धता के मापदंड पर क्षत्रिय ही सर्वश्रेष्ठ हैं।

वर्णों की उत्पत्ति के विषय में बुद्ध ने 'अग्गञ्ञ सुत्त' में एक विशिष्ट कथा का प्रतिपादन किया है। बुद्ध के अनुसार, 'शूद्र' वे बने जिन्होंने 'लुट्ठाचार' (लूट) और 'क्षुद्र आचार' (बुरे कर्म) किए। यहाँ 'शूद्र' शब्द की व्युत्पत्ति को ही उन्होंने बुरे आचरण से जोड़ दिया। इसके अतिरिक्त, महायान ग्रंथ 'ललितविस्तर' स्पष्ट करता है कि बोधिसत्व कभी भी 'नीच' कुलों में जन्म नहीं लेते; वे केवल ब्राह्मण या क्षत्रिय कुलों में ही अवतरित होते हैं। ग्रंथ के अनुसार, जब समाज में ब्राह्मणों का वर्चस्व होता है तो वे ब्राह्मण कुल चुनते हैं, और जब क्षत्रिय प्रबल होते हैं तो वे क्षत्रिय कुल में जन्म लेते हैं।

"गोत्र को लेकर चलने वालों में क्षत्रिय श्रेष्ठ है और जो विद्या और आचरण से युक्त है, वह देवता और मनुष्य में श्रेष्ठ है।"
4. कर्म, पुनर्जन्म और जाति का संबंध बुद्ध के दर्शन में कर्म का सिद्धांत सामाजिक स्थिति से अटूट रूप से जुड़ा है। उन्होंने 'तमो-तमो परायण' (अंधकार से अंधकार की ओर) और 'ज्योति-ज्योति परायण' (प्रकाश से प्रकाश की ओर) के माध्यम से यह समझाया कि व्यक्ति का जन्म किस कुल में होता है, यह उसके प्रारब्ध का परिणाम है। बुद्ध के अनुसार, जो लोग पूर्व जन्म में अकुशल कर्म करते हैं, वे 'नीच कुल' जैसे चांडाल, निषाद, रथकार या दरिद्र परिवारों में जन्म लेते हैं। इसके विपरीत, कुशल कर्म करने वाले क्षत्रिय या ब्राह्मण जैसे 'उच्च कुलों' में जन्म लेते हैं। यहाँ बुद्ध स्पष्ट रूप से चांडाल और निषाद कुलों को 'नीच कुल' की श्रेणी में रखते हैं, जो दर्शाता है कि उनका कर्म-सिद्धांत पारंपरिक वर्ण-सिद्धांत के ही समानांतर कार्य करता था।
5. 'आर्य' शब्द का वास्तविक अर्थ और बुद्ध आधुनिक 'आर्य आक्रमण सिद्धांत' (AMT) के विपरीत, बुद्ध के लिए 'आर्य' शब्द किसी विदेशी नस्ल का नहीं, बल्कि श्रेष्ठता, विद्या और चरित्र का परिचायक था। बुद्ध ने अपने मार्ग को 'आर्य मार्ग' और अपने धर्म को 'आर्य धर्म' कहा। भाषाई दृष्टि से भी देखें तो बुद्ध की भाषा (पालि) स्वयं संस्कृत से निकटता रखने वाली एक 'आर्य परिवार' की भाषा है। यह तथ्य बुद्ध को किसी 'गैर-आर्य' या 'विदेशी' पहचान के बजाय आर्य संस्कृति के केंद्र में स्थापित करता है। बुद्ध के समय में 'आर्य' और 'मूलनिवासी' जैसा कोई नस्लीय विभाजन अस्तित्व में नहीं था; आर्य होना एक सांस्कृतिक और नैतिक उत्कर्ष का प्रमाण था।
6. बौद्ध संघ और महिलाएं: एक कठिन मार्ग बौद्ध संघ में महिलाओं (भिक्षुणियों) का प्रवेश बुद्ध के लिए एक अत्यंत कठिन और विवादास्पद निर्णय था। अपनी विमाता महाप्रजापति गौतमी के बार-बार अनुनय करने पर ही उन्होंने स्त्रियों को संघ में सम्मिलित किया, परंतु इसके साथ 'आठ कड़े नियम' (गुरूधम्म) आरोपित किए। बुद्ध ने यहाँ तक कहा कि स्त्रियों के प्रवेश से उनके सद्धर्म की आयु १००० वर्ष से घटकर केवल ५०० वर्ष रह जाएगी। एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बुद्ध ने 'स्थान-अस्थान' (संभव-असंभव) का तर्क देते हुए स्पष्ट किया कि एक स्त्री के लिए 'सम्यक सम्बुद्ध' बनना असंभव है, जबकि एक पुरुष के लिए यह संभव है।
"जिस प्रकार पाँव से घर में पकड़ा गया बाघ का बच्चा बड़ा होने पर हत्या करता है, उसी प्रकार स्त्रियों का संसर्ग बहुत से अनर्थों का कारण है।" (अश्वघोष, सौंदरानंद महाकाव्य)
7. निष्कर्ष: एक नई दृष्टि गौतम बुद्ध एक अत्यंत जटिल और बहुआयामी व्यक्तित्व थे, जिन्हें केवल आधुनिक राजनीतिक चश्मे से देखना ऐतिहासिक सत्य के साथ अन्याय होगा। बुद्ध के उपदेशों में एक स्पष्ट द्वैत दिखाई देता है: एक 'उच्च दार्शनिक स्तर' (Higher Philosophical Plane) जहाँ वे निर्वाण के लिए वर्ण के महत्व को नकारते हैं, और दूसरा 'सामाजिक स्तर' (Lower Social Plane) जहाँ वे कुल, गोत्र और जाति की शुद्धता के प्रबल समर्थक दिखाई देते हैं। वे वर्ण व्यवस्था के उन्मूलक नहीं, बल्कि उसके एक नए संस्करण के व्याख्याता थे जिसमें क्षत्रिय धर्म को प्रधानता दी गई थी।
अंततः हमें यह विचार करना होगा: क्या हम किसी महापुरुष को उनकी संपूर्णता और उनके वास्तविक ऐतिहासिक संदर्भ में स्वीकार करने का साहस रखते हैं, या हम केवल अपने वैचारिक तुष्टीकरण के लिए इतिहास के चुनिंदा पन्नों को ही पढ़ना चाहते हैं?
Courtesy 
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